Sunday, November 16, 2008

मेरा लक्ष्य(माई ऐम)

मेरा लक्ष्य इस देश की सेवा करना है । मै सरकारी नौकरी पर कार्यरत हो कर भी देश को आगे बढ़ने में मदद कर सकता हूँ इन सबों के लिए सबसे जरुरी है एक शिक्षित नागरिक बनना ,क्योंकि सही सुचना के आधार पर ही कोई फ़ैसला जन हित के लिए लिया जा सकता है । भारत की प्रशासनिक सेवाओं में कार्य भार सम्हाल कर मै देश के हर तबके के लोगो के आम और खाश अधिकारों तक पहुचाने में मदद करूँगा । देश में फैली असामाजिक कुरीतिओं का नाश करूँगा ,यहाँ फैली हुई आतंकवादी गतिविधिओं का जड़ से नाश करूँगा , और अपने आप को देश के लिए समर्पित करने को हमेशा से तैयार रहूँगा ।

करेंट अफेयर्स (परमाणु समझौता ).

तीन साल के गहन विचार विमर्शों के बाद आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच११ अक्टूबर २००८ को वॉशिंगटन में परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हो ही गया । इस समझौते में भारत ने इंधन सप्लाई को कानूनी तौर पर बेजोड़ बताया और उम्मीद जताई गई की दोनों देश इसे लागु करने को बाध्य होंगे । १२३ समझौता ,जिसके तहत परमाणु समझौते को लागू किया गया, इस पर विदेश मंत्री प्रणब मुख़र्जी और यू .एस सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मिस कोन्दोल्लेज्ज़ा राइस ने हस्ताक्षर किए । इस समझौते ने अमेरिकन कंपनियों को मल्टी बिलयन भारतीय परमाणु पाइप में हिस्सा का अधिकार दे दिया। परमाणु क्षेत्र में नए नीतिओं का समापन ,आज तीन साल बाद हुआ है जिस पर बात , प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और यू .एस .प्रेजिडेंट जॉर्ज .बुश द्वारा १८ जुलाई २००५ में शुरू हुई । यू .एस के अवरोध के कारन ही १९७४ में प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी के शासन काल में परमाणु विस्फोट किया गया था जिसे की १९९८ अटल बिहारी वाजपई के शासन काल में और अधिक शक्तिशाली बनने के लिए पाँच परमाणु विस्फोट किए गए । यू.एस ने १२३ समझौते में ५-६ अनुच्छेदों के अनुसार ,आई.ए.ई.ए के देख रेख में भारत को आजीवन परमाणु इंधन सप्लाई करने का आश्वासन दिया है ।

फारसी भाषा

फारसी भाषा का महत्वा केवल वर्त्तमान में ही नही है बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका महत्वा अतुल्य था । विदेशी भाषा होने के अतिरिक्त भाषा ने भारत पर सदियों तक राज किया ,और अपने शब्दों का एक अमिट प्रभाव छोर गया । आज भी भारत की भाषा हिन्दी में फारसी भाषा के अनेक शब्द पायें जातें है । इस भाषा का इतना प्रभावशाली होने के पीछे जो कारण है , अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटे तो हमें साफ पता चल जाता है ,क्योंकि भारत के इतिहास में मुग़लों के काल से ,और उससे भी पहले से इस भाषा का प्रयोग होता आ रहा है । कई राजाओं , महाराजाओं के शासन काल में यह प्रशासन के लिए एक मात्र उपयुक्त भाषा माना जाता रहा है । वर्त्तमान काल में यह भाषा इरान की एक प्रमुख भाषा है । यह भाषा इरान अफगानिस्तान ,उज़बेकिस्तान के दक्षिणी भाग , ताजिकिस्तान , जैसे क्षेत्रों में बोली जाती है । कई प्रसिद्ध कवि , गायक ,शायर ,जिन्होंनें इस दुनिया में एक अमिट छाप छोडा,इसी भाषा से ताल्लुक रखते थें ,इनमे से महा न कवि रूमी ,अब्दुल्लाह रहीम इत्यादि बहुत ही प्रसिद्द हैं । आज भी भारत के विभिन्न विद्यालय में और महाविद्यालय में इस भाषा की पढ़ाई जोरो शोरो से होती है । इसमे कोई संदेह नही की इस भाषा ने काफी तरक्की की और आगे भी इसका भविष्य उज्वल है ।

फारसी भाषा केन्द्र (विभाग ) ..

फारसी भाषा केन्द्र जेएनयू के एस.एल विद्यालय में एक केन्द्र (विभाग) है , जिसमे फारसी भाषा की पढ़ाई होती है, यह एक बहुत ही पुराना केन्द्र है ,इस केन्द्र में बी.ए , एम् .ए, एम् -फिल, पि.एच.डी की पढ़ाई होती है । वर्त्तमान समय में इस केन्द्र का अध्यक्ष डॉक्टर अख्तर मेहदी है ,जिन्होने इस केन्द्र का बाग़ डोर सम्हाल कर रखा है । फारसी केन्द्र में ७ शिक्षक नियमित रूप से है ,जो की इस प्रकार है --डॉ.अख्तर हुसैन, डॉ नियाज्मन ,डॉ कासमी मैडम ,डॉ अखलाक अहमद ,डॉ अख्तर मेहदी। इनके अलावा डॉ मुमताज़ अहमद ,अब्दुल्ला अमीरी , और एक अफ्गानिश्तान की शिक्षिका है जिनका नाम फताना मैडम है। इस केन्द्र में हर बार प्रवेश परीक्षा के द्वारा छात्रों को दाखिला मिलता है ,इतना ही नही बी.ए , द्वितीय श्रेणी में भी नए छात्रों को साक्षात्कार के बाद प्रवेश मिलता है । यह केन्द्र अपने छात्रों की उन्नति के लिए ,उच्च तकनिकी शिक्षा का मध्यम अपनाती है , छात्रों की भाषा शैली में सुधार लाने के लिए ,भाषा प्रयोगशाला की भी क्लास करवाती है ,और इस भाषा से सम्बंधित देश के लोगो से बात-चित करने का मौका देती है ,जिससे छात्रों को सही उच्चारण करने में आसानी होती है । इस भाषा केन्द्र में बी.ए, में कुल १५० छात्र है । इस केन्द्र में हर एक शिक्षक इस भाषा की व्याकरण और भाषा शैली से पूर्ण ढंग से निपुण है और कुशलता पूर्वक इस भाषा केन्द्र का परिणाम १०० प्रतिशत होता है । शिक्षक इन छात्रों के उज्वल भविष्य के लिए और छात्र इस देश की उज्वल भविष्य के लिए दिन रात कार्यरत है ।

Saturday, November 15, 2008

एस.एल.एल.एंड सी. एस

जेएनयू के विभिन्न विद्यालयों में (एस.एल.एल.और सी .एस.)ही एक ही ऐसा विद्यालय हैं जिसमें स्नातक की पढ़ाई होती हैं । इसमे भी छात्र संपूर्ण भारतीय स्तरीय प्रवेश परीक्षा के द्वारा पढने को आते है । इस विद्यालय में विदेशी भाषाओँ की शिक्षा दी जाती है । इस विद्यालय में कुल मिला कर ९ भाषाओँ की पढ़ाई होती है ,इन भाषाओँ में चीनी, जापानी, कोरियन, ज़र्मन , फ्रेंच, स्पेनी , रशियन , अरबी आदि मुख्या है ,इसके अलावा वैकल्पिक विषयों के द्वारा तुर्किश, ग्रीक, हिब्रू, हिन्दी, उर्दू इत्यादि भाषाओँ की पढ़ाई होती है । हर एक केन्द्र में एक अध्यक्ष किए जाते है ,जो की अपने विशिष्ठ केन्द्रों को अव्वलता की चोटियों पर ले जाने के लिए नए -नए नियमों को लागु करते है । छात्रों की भाषाओँ को मजबूत बनने के लिए भाषा प्रयोगशाला की स्थापना की गई है जिसमे उच्च तकनिकी मशीनों को विदेशों से मंगवाया गया है ,तथा इन मशीनों की देख भाल के लिए कुशल नियंत्रकों को नियुक्त किया गया है । इन सरे केन्द्रों मेंअपने अपने विषयों से सम्बंधित निपुण शिक्षकों को विदेशों से आमंत्रित किया जाता है ताकि छात्रों की भाषा उच्चारण सटीक हो । एस.एल में सबसे ऊपर के तबके पर डीन का स्तर होता है, जिनके द्वारा इस विद्यालय को सफलता पूर्वक संचालित किया जाता । एस.एल का प्रशासन इनके ही हाथों में होता है। हर एक केन्द्र में लगभग ३० छात्र होते है । इस विद्यालय में शान्ति और अनुशासन बनाये रखने में छात्रों की अहम् भूमिका होती है । प्रत्येक वर्ष इस विद्यालय में छात्रों के द्वारा चुनाव होते है जिसमे इन छात्रों के बिच से पाँच प्रतिनिधिओं को चुना जाता है , जो की एस.एल की साफ सफाई और छात्रों की समस्याओं का हल करने में सदा तत्पर रहते है । इस विद्यालय का परीक्षा फल १०० प्रतिशत होता है , इस विद्यालय के छात्र बहुत ही सजग , जागरुक और परिश्रमी है और अपने कार्य के प्रति बहुत ही निष्ठा बद्ध होते है । एस.एल के शिक्षक अपने - अपने विषय में निपुण तथा पारंगत है ,कई शिक्षकों ने तो अपनी उच्च शिक्षा विदेशों से प्राप्त की है। इस तरह हमारा एस.एल अपने आप में एक बहुत ही अच्छा विद्यालय है । इस विद्यालय से स्नातक के बाद छात्रों के लिए रोज़गार के अवसर खुल जाते है , जो छात्र रूपया कमाना चाहते है वो किसी अच्छी कंपनी में कम करते है और जो आगे की पढ़ाई करना चाहते है वो उच्च शिक्षा या तो जेएनयू में प्राप्त करते है या फिर सम्बन्धित विषय से विदेश में पढ़ाई करते है ।

जेएनयू

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी ,भारत की राजधानी दिल्ली में नई दिल्ली में स्थित है । इस विश्वविद्वालय को १९६५ के एक्ट के तहत बनवाया गया था ,परन्तु यह १९६६ से प्रारम्भ हुआ । यह केन्द्र सरकार द्वारा निर्मित एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है । जेएनयू में बी.ऐ , ऍम.ऐ ,ऍम.फिल तथा पी.एच.दी की पढ़ाई का प्रावधान है । इस विश्वविद्यालय में पढने के लिए छात्रों को प्रवेश परीक्षा पास करना होता है। जेएनयू में भारत के कोने कोने से लोग पढने आते है और यहाँ से उच्च शिक्षा प्राप्त कर विश्व के बड़े बड़े श्रेणियों पर आयुक्त किए जाते है और केवल भारत को ही नही बल्कि पुरे विश्व को सेवा प्रदान करते है । यहाँ की शिक्षा प्रणाली में गुरुकुल और तकनिकी दोनों प्रकार कि प्रणालियाँ देखने को मिलती है ,गुरुकुल कहने का आशय इस तरह से है की यह वृक्षों , कंदराओं और पशु- पक्षियों से भरा हुआ है ,और तकनिकी कहने से आशय है की यहाँ जानकारी प्राप्त करने के लिए उच्च तकनिकी कंप्यूटर ,एल.सी .डी,तथा विदेशों से आयत विधयूत चालक यन्त्र और अन्य अनेक उपकरण स्थित है। जेएनयू में १० अलग अलग विद्यालय है तथा हर विद्यालय अपने आप में सम्पूर्ण एवं दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय को टक्कर देंने में सक्षम हैं । इन विद्यालयों में "एस .एल.एल.एंड सी .एस ,एस.आई .एस , एस.एस.एस ,स्कूल ऑफ़ एन्विरोंमेंतल साइंस ,स्कूल ऑफ़ लाइफ साइंस ,स्कूल ऑफ़ कंप्यूटर साइंस , स्कूल ऑफ़ आर्ट्स एंड एस्तेतिक्स ,स्कूल ऑफ़ मोलिकुलर बायोलोजी , कानून विद्यालय , इत्यादि सामिल हैं । जेएनयू में १२ छात्रावास भी है और हर छात्रावास में चार कि संख्या में शिक्षकों को आवास के लिए घर दिया गया है ,इन शिक्षकों कि देख रेख में छात्र अपनी पढ़ाई जारी रखते है और अव्वल सिद्ध होते है । जेएनयू के हॉस्टल कुछ इस प्रकार है --झेलम ,गंगा ,यमुना ,सतलुज ,पेरियार ,कावेरी ,नर्मदा ,तपती ,माहि- मांडवी ,लोहित ,चंद्रभागा और एक नव निर्मित हॉस्टल कोयना आदि ।

रांची

रांची शहर झारखंड की राजधानी है। यह झारखंड के लगभग मध्य में स्थित है। इसके उत्तर में हजारीबाग, दक्षिण में पश्चिमी सिंहभूम, पूर्व में राज्यों की सीमाएं हैं तथा पश्चिम में पलामू, लोहरदगा, गुमला इत्यादि स्थित है। इस शहर की भू आकृती में कई भिन्नताएं हैं। जैसे इसकी उत्तरी सीमा पर दामोदर घाटी है तो पश्चिम में ऊँचे पठार। यह शहर ७५७४ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बसा है और २००१ के अनुसार इसकी जनसंख्या २७८३५५७ है। कुछ लोगों का कहना है की रांची शब्द पुरानी रांची जो की रांची के समीप एक छोटा सा गाँव है उससे आया है। और कुछ कहते हैं की यह शब्द मुंडारी शब्द अरंची से आया है जिसका मतलब है एक छोटी छडी जो की पशुओं के चराने के काम आती थी। इस शहर की भूमी ग्रेनाईट, चिस्ट्स से बना है। इस शहर की प्रमुख नदीयाँ- स्वर्णरेखा, दक्षिणी कोयल और शंख है। स्वर्णरेखा की तीन द्रोनीयाँ है - कोकरो, कांची, करकरी। स्वर्णरेखा से हुन्डरु और जोन्हा जैसे झीलों का आविर्भाव होता है जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग देश भर से आते हैं और आनंद लेते हैं।

झेलम छात्रावास

मैं झेलम छातरावास का वासी हूँ। झेलम छातरावास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उत्तराखंड में आता है। इस छातरावास के समीप गंगा , सुत्लुज छात्रावास तथा यमुना छात्रावास आता है। झेलम छात्रावास की स्थापना ८० के दसक मे हुई थी। इस छात्रावास मे पहले छात्र और छात्राएं दोनों रहते थे। पूर्वी भाग मे छात्र और पश्चिमी भाग मे छात्राएं रहती थी। लेकिन अब यहाँ केवल छात्र ही रहते हैं। इस छात्रावास मे स्नातक से लेकर पी एच डी तक के छात्र रहते है। इस छात्रावास में चार वार्डेन है- माधव गोविन्द, पी सुब्बा राव अमित प्रकाश , स्वागत बिधुरी है। यहाँ करीब३५० छात्र रहते है। यह छात्रावास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का सबसे पुराना छात्रावास है। यहाँ मुख्यता वरिष्ट छात्र ही रहते है जिस कारण यहाँ छात्रों मे बढ़िया तालमेल रहता है। इस छात्रवस् के सामने झेलम लॉन है जहाँ चाट सम्मेलन , फ़ूड फेस्टिवल तथा चुनाव सम्बंधित कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। ऐसा माना जाता है की झेलम छात्रवस् का खाना पुरे जे एन यु मे सबसे अच्छा है।

सिक्के की औक़ात

एक बार
बरखुरदार!
एक रुपए के सिक्के
और पाँच पैसे के सिक्के में
लड़ाई हो गई,
पर्स के अंदर
हाथापाई हो गई।
जब पाँच का सिक्का
दनदना गया
तो रुपया झनझना गया-
पिद्दी न पिद्दी की दुम
अपने आपको
क्या समझते हो तुम!
मुझसे लड़ते हो,
औक़ात देखी है
जो अकड़ते हो!

इतना कहकर मार दिया धक्का,
सुबकते हुए बोला
पाँच का सिक्का-
हमें छोटा समझकर
दबाते हैं,
कुछ भी कह लें
दान-पुन्न के काम तो
हम ही आते हैं।

- अशोक चक्रधर

सीधी है भाषा बसंत की

सीधी है भाषा
बसंत की

कभी आँख ने समझी
कभी कान ने पाई
कभी रोम-रोम से
प्राणों में भर आई
और है कहानी
दिगंत की

नीले आकाश में
नई ज्योति छा गई
कब से प्रतीक्षा थी
वही बात आ गई
एक लहर फैली
अनंत की


-त्रिलोचन

जग में मेरा गीत न होता

गर जग में
मेरा गीत न होता
गूँगी पीर ब्याहता कौन

बिकती न आहों की गठरी
मुस्कानों की मंडी में
वरमाल किसे पहनाती तृष्णा
तृप्ति की पगडंडी में
अपयश किसे सुनाता किस्से
और उनको गीत बनाता कौन
गर जग में
मेरा गीत न होता
गूँगी पीर ब्याहता कौन

चाह तो होती पर
चाहत पर मिटना ही बस धर्म न होता
गुस्ताख़ हवा गुस्ताख़ न होती
प्यार बेशरम प्यार न होता
कौन पवन बन आता सुमुखि
आँचल को सरकाता कौन
गर जग में
मेरा गीत न होता
गूँगी पीर ब्याहता कौन

--दिव्यनिधि शर्मा

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर?
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर!
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

-
शिवमंगल सिंह 'सुमन'.

था तुम्हें मैंने रुलाया!

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर -
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!


- हरिवंश राय बच्चन

कनुप्रिया (समापन:समापन)

क्या तुमने उस वेला मुझे बुलाया था कनु?
लो, मैं सब छोड़-छाड़ कर आ गयी!

इसी लिए तब
मैं तुममें बूँद की तरह विलीन नहीं हुई थी,
इसी लिए मैंने अस्वीकार कर दिया था
तुम्हारे गोलोक का
कालावधिहीन रास,

क्योंकि मुझे फिर आना था!

तुमने मुझे पुकारा था न
मैं आ गई हूँ कनु।

और जन्मांतरों की अनन्त पगडण्डी के
कठिनतम मोड़ पर खड़ी होकर
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।
कि, इस बार इतिहास बनाते समय
तुम अकेले ना छूट जाओ!

सुनो मेरे प्यार!
प्रगाढ़ केलिक्षणों में अपनी अंतरंग
सखी को तुमने बाँहों में गूँथा
पर उसे इतिहास में गूँथने से हिचक क्यों गए प्रभु?

बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता
तुम्हारे इतिहास का
शब्द, शब्द, शब्द…
राधा के बिना
सब
रक्त के प्यासे
अर्थहीन शब्द!

सुनो मेरे प्यार!
तुम्हें मेरी ज़रूरत थी न, लो मैं सब छोड़कर आ गई हूँ
ताकि कोई यह न कहे
कि तुम्हारी अंतरंग केलिसखी
केवल तुम्हारे साँवरे तन के नशीले संगीत की
लय बन तक रह गई……

मैं आ गई हूँ प्रिय!
मेरी वेणी में अग्निपुष्प गूँथने वाली
तुम्हारी उँगलियाँ
अब इतिहास में अर्थ क्यों नहीं गूँथती?

तुमने मुझे पुकारा था न!

मैं पगडण्डी के कठिनतम मोड़ पर
तुम्हारी प्रतीक्षा में
अडिग खड़ी हूँ, कनु मेरे!


- धर्मवीर भारती

चाँद और कवि

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज बनता और कल फिर फूट जाता है
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।


-रामधारी सिंह दिनकर

Friday, October 31, 2008

हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती...


नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ्ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है

मन् का विश्वास रगों में साहस बनता है
चढ़ कर गिरना , गिर कर चढ़ना ना अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती....


डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगता है
जा जा कर खाली हाथ लौट आता है
मिलते ना सहज ही मोती पानी में
बहता दूना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती....

असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो
जब तक ना सफल हो नींद चैन की त्यागो तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती....
- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

शक्ति और क्षमा

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

- रामधारी सिंह दिनकर